सभी कविताएँवीर रस

मैं कर्ण हूँ

यह कविता एक ऐसे योद्धा के बारे में है जो महाभारत में सब पर भारी था- सूर्यपुत्र कर्ण

Bikesh 17 अगस्त 2026 1 मिनट पठन
मैं कर्ण हूँ
सूर्यपुत्र था मैं, पर सूतपुत्र कहलाया गया, जन्म से ही नहीं, जीवन भर ठुकराया गया। पांडवों में ज्येष्ठ था मैं, फिर भी सम्मान मुझे कौरवों ने दिया, अंगदेश का राज, और मित्रता का विश्वास दिया।
कवच कुंडल थे मेरे पास, पिता सूर्य का वरदान मां कुंती की मौन वेदना, और मेरी पहचान।
जब गंगा में बहाया गया, तब यही कवच कुंडल मेरी सांसों का आधार बने, और जीवन ने मुझे एक और अवसर दिया। सूत कुल में पला बढ़ा, अंग देश मेरा स्वाभिमान बना,
गुरु द्रोण की दृष्टि में मैं गैर-क्षत्रिय था, जिस कारण मैं युद्ध कला उनसे सीख ना सका। धनुर विद्या की आग में मैं भेष बदल कर पहुंचा परशुराम के चरणों में, ज्ञान मिला पर साथ ही मिला एक भयावह श्राप। "अंतिम क्षणों में तू अपनी विद्या भूल जाएगा" और कुरुक्षेत्र में वही क्षण आया। धरती ने मेरा रथ जकड़ लिया, स्मृति ने मेरा साथ छोड़ा, और अर्जुन ने छल से मेरा वध किया।
हार मैंने नहीं मानी थी, मृत्यु मुझ पर थोप दी गई, क्योंकि दानवीर था मैं, और इंद्र ब्राह्मण बन मेरे कवच कुंडल मांग ले गए।
अंतिम सांसों तक मैं लड़ा मित्र दुर्योधन के लिए, क्योंकि जिसने मुझे अपनाया था, मैं उसे छोड़ नहीं सकता था।
मां कुंती को वचन दिया था, मैं मर जाऊंगा, पर अपने पांडु भ्राताओं पर शस्त्र नहीं उठाऊंगा। शक्ति में अर्जुन से कम ना था मैं, पर क्या धर्म यही होता कि भाई की मृत्यु का कारण भाई ही हो?
हां मैं अधर्म की सेना में था, पर धर्म मैं नहीं छोड़ा, क्योंकि अधर्म के दल में भी किसी ने मुझे अपना समझा था। सब कहते हैं दुर्योधन पापी था, तो क्या द्वापर के उस गोविंद का कोई दोष नहीं, जिसने दो भाइयों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया?
मैं कर्ण था, द्वापर का कर्ण जिसने सब कुछ पाया अपमान के साथ, और सब कुछ खो दिया सम्मान के साथ। जिसने जो दिया, मैंने उसे अपनी अंतिम सांस तक निभाया।

संबंधित पठन