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महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा

Bikesh 17 अगस्त 2026 1 मिनट पठन
महाराणा प्रताप
एक था महाराणा प्रताप, जो लड़ गया था स्वाभिमान के लिए, मुगलों की काली छाया में भी अडिग रहा वह अपने मान के लिए।
हल्दीघाटी की रणभूमि में मानसिंह की रणनीति सफल हुई, पर रणधीर चेतक ने अंतिम क्षण तक राणा की रक्षा कर दी।
चेतक की अंतिम सांसों पर फूट फूट कर रोए थे राणा, फिर मेवाड़ के जंगलों में छुप कर रहने को विवश हो गए थे राणा।
जंगल की ठंडी रातों में, जब रोती हुई बिटिया ने पूछा- "कहां गए चांदी के वो थाल जहां मेरी मिठाई परोसी जाती थी? कहां गई मखमली बिस्तर वाली रात, जहां मां मुझे लोरी सुनाती थी? और क्यों रहना पड़ता है हमें इस डरावने जंगल में, जहां मेरी रोटी भी शैतानी बिल्ली झूठी कर जाती है?"
बिटिया के इन शब्दों ने राणा का दिल झकझोर दिया, वह संधि पत्र लिखने को अकबर के सामने मजबूर हुआ।
पर रानी ने रोक लिया- "क्या भूल गए रक्त से बहे बलिदान? अगर स्वाभिमान मर गया आपका, तो दीजिए तलवार- मैं ही काट लाऊं दुश्मन के सिर दो चार"।
रानी के साहस ने राणा में फिर जोश जगाया- "हां मुझे याद है हर वीर सिपाही का बलिदान, अब मैं नहीं मानूंगा अपनी हार"।
पर दुविधा भी थी, दुश्मन सैनिक कभी भी उन तक पहुंच सकते थे, इसलिए मेवाड़ के जंगल को छोड़कर राणा निकल पड़ते हैं सुरक्षित स्थान की ओर।
जंगल छोड़ते समय भामाशाह मिला राणा को; धन की पोटली खोल कर बोला- "प्रताप, फिर से सेना सजाए और मेवाड़ को गुलामी की बेड़ियों से, हमेशा के लिए आज़ाद कर दीजिए।"
भामाशाह के साथ और लोकबल से, राणा फिर रण में उतरे, और मेवाड़ की धरा में अपने पराक्रम का दीप जला गए।
आज भी महाराणा प्रताप सिर्फ इतिहास नहीं स्वाभिमान की धड़कन है।

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