
जल उठी थी ज्वाला फिर से
अग्निकुंड के ताप में,
भय भी थर्राया था
रानी पद्मावती के जौहर के प्रताप में।
राजपूती वीरांगनाओं ने
अस्तित्व पर न आने दी आंच,
खिलजी की पैनी नजर को भी
पद्मिनी की छवि को ना छूने दी।
लड़ते रहे शूरवीर रण में,
बलिदान हुए एक एक कर,
पर दिल्ली का सुल्तान जीत न सका,
मेवाड़ी आन,बान और शान।
जब छल से खिलजी ने
राणा रतन को बंदीगृह में कैद किया,
और पद्मिनी को दिल्ली पहुंचने का अपमानित आदेश दिया।
राणा की कैद की खबर मिलते ही
रानी ने अपने रतन को
वापस चित्तौड़ लाने की योजना बनाई।
गोरा-बादल की अगवाई में
साथ सौ डोले सज कर तैयार हुए,
हर डोले में भेष बदलकर बैठा
एक वीर मेवाड़ी,
और कंधों पर डोले उठाए
सजग,निर्भीक सिपाही।
राजपूती चतुराई ने
दिल्ली के गढ़ में सेंध लगाई,
खिलजी का क्रोध फूट पड़ा,
सेना को मृत्युध्वनी सुनाई।
डोले से निकली तलवारे
रक्त की होली खेल रही थी,
गोरा-बादल के नेतृत्व में
राजपूतों ने लिखी शौर्य की कहानी।
राणा रतन को सुरक्षित कर
दोनों वीर अमर हो गए,
पर खिलजी की अपमानित आंखे,
चित्तौड़ के द्वार पर आ पहुंची।
संख्या में कम,पर साहस अपार लेकर,
टकराई राजपूती तलवारे
दुश्मन की टंकारो से
धरती कांपी,आकाश पुकारा,
एक एक कर हुए वीर न्योछावर सारे।
राणा रतन ने भी अंत में
माटी पर प्राण वार दिए,
मेवाड़ की आन,बान, शान के लिए
अपने रक्त से युद्ध की गाथा को अमर कर गए।
और फिर जली ज्वाला-
अग्निकुंड हुआ प्रचंड,
खिलजी की काली नज़र को
जौहर की उस ज्वाला ने
पद्मावती के साये से भी भेंट न होने दी।


