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युद्ध की गाथा

यह कविता युद्ध के विध्वंसक परिणाम और युद्ध की कल्पना के बारे में है

Bikesh 19 अगस्त 2026 1 मिनट पठन
युद्ध की गाथा
कितनों के लहू बहे हैं इस दो धारी तलवारों के बीच, कई दिनों तक यह भूमि लाल पड़ी है और सूनी सी, कितनों के हैं घर उजड़े इस धरा और अंबर के बीच, विध्वंस हुआ इतना प्रबल कि गूंज उठा हर क्षितिज प्रखर,
हर‌ शोणित युद्ध से मच जाता है हाहाकार अधिपत्य जमाने के लिए कई कर देते हैं नरसंहार, एक युद्ध ऐसा भी हुआ महाभारत नाम से प्रख्यात हुआ, कुरुक्षेत्र के मैदान में संग्राम बड़ा भीषण हुआ, कितनों के लहू बहे हैं इस दो धारी तलवारों के बीच, कई दिनों तक यह भूमि लाल पड़ी है और सूनी सी,
सर्वस्त्र बचाने के लिए होते थे युद्ध गंभीर, लहू से सींची जाती थी हर युद्ध की जीत, मानवता पर काल बनकर युद्ध हुए कई बार भीषण हर बार गूंज उठी ये धरती खूनी दो धारी तलवारों के बीच, समय का चक्र हुआ प्रबल युद्ध से परिभाषित हुई दुनिया लहू नहीं कलम की स्याही ने कई विकराल युद्ध को रोक लिया,
कितनों के लहू बहे हैं इस दो धारी तलवारों के बीच, कई दिनों तक यह भूमि लाल पड़ी है और सूनी सी।।

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