
हर स्त्री उर्वशी नहीं बनना चाहती है,
स्त्री समाज भी,
सभ्यता की रेखा खींचना जानता है।
हर सवाल का जवाब,
हर उस महिला को भी जानने का हक है,
जिसमें उसे,
अपने ही हक से वंचित होना पड़ता है।
मर्यादा में,
अगर राम रह सकते हैं,
तो नारी भी सीता बनकर,
अपने वजूद की अग्निपरीक्षा दे सकती है।
परंतु स्त्री जब 'नारीत्व' का बोध,
अपने भीतर समाहित करती है,
तब सचमुच स्त्री होना गर्व का विषय होता है।
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